किसान का संघर्ष हमेशा से कहानी का हिस्सा रहा है। खेतों से लेकर बाज़ार तक, मेहनत और उम्मीद के सहारे वे अपनी ज़िंदगी संवारते आए हैं। लेकिन जैसे-जैसे श्रम की कमी, बढ़ती लागत और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां सामने आईं, खेती की राह और कठिन होती चली गई। यही वह समय था जब एक सोच ने किसानों को नई उम्मीद दी। यह सोच थी—छोटे और सस्ते कृषि उपकरण किसानों तक पहुँचाना। किसान की ज़रूरत से जन्मी सोच ने आज देश की खेती को नई दिशा दे दी है। बेंगलुरु के एक छोटे से गैराज में बैठे हुए, 2005 में रविंद्र अग्रवाल के मन में सिर्फ एक सवाल था – “हमारे छोटे किसान कभी अपनी खेतों में मशीनों की ताकत का लाभ क्यों नहीं ले पाते?”। उस दौर में खेती का मैकेनाइजेशन केवल बड़े किसानों और बड़े खेतों तक सीमित था। सीमांत और छोटे किसानों के पास न तो बड़े महंगे ट्रैक्टर खरीदने की क्षमता थी और न ही ऐसी मशीनों का उपयोग उनके छोटे खेतों में संभव था। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए किसानक्राफ्ट की नींव रखी गई। 20 बरस बाद, आज यही कंपनी भारत के 50 लाख से अधिक किसानों की जिंदगी बदल चुकी है। कंपनी ने छोटे और हल्के कृषि यंत्र बनाकर उन तक पहुँचाए हैं, जो सीमांत और पहाड़ी किसानों के लिए वरदान साबित हुए हैं। कृषि के इन उपकरणों ने सिर्फ मैदानी इलाकों में ही नहीं बल्कि हिमाचल, उत्तराखंड और लद्दाख जैसे पहाड़ी राज्यों में जहां खेती करना हमेशा कठिन और चुनौतीपूर्ण रहा है। जहां खेत छोटे-छोटे टेढे-मेढ़े टुकड़ों में बंटे हैं, बड़े ट्रैक्टरों का प्रयोग असंभव है, और मजदूरी का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। इन्हीं हालात में किसानक्राफ्ट के मिनी पावर टीलर, पावर वीडर और छोटे ट्रैक्टर किसानों के सबसे बड़े साथी बने। ये हल्के उपकरण पगडंडियों जैसे रास्तों पर आसानी से खेतों तक पहुँच जाते हैं और सीढ़ीनुमा खेतों की जुताई भी कर सकते हैं। हिमाचल के कबाईली क्षेत्र लाहौल-स्पीति में खेती करना चुनौतियों से भरा होता है। यहां के किसान कहते हैं कि आज के समय में बैल रखना बहुत मुश्किल हो गया है। हमारे यहां चारे की बहुत कमी होती है। इसके अलावा बैलों से जुताई में समय भी बहुत अधिक लग जाता है जबकि हमारे पास साल में एक ही क्रापिंग सीजन होता है तो सब जल्दी जल्दी करना होता है। इसलिए जुताई के लिए पावर टीलर आने के बाद यहां के किसानों की जिंदगी बदल गई है। मंडी जिला के किसान अजय कुमार बताते हैं कि हमारे यहाँ मजदूरी मिलना मुश्किल है। पहले सारी खेती हाथ और बैलों से करनी पड़ती थी। हम छोटे किसान हैं और हमारे यहां बड़ा ट्रैक्टर भी नहीं चल सकता ऐसे में अब छोटे-छोटे पावर टीलर और अन्य उपकरणों के आने से खेती की विभिन्न फसलों की बोआई, कटाई और छंटाई में आसानी हो जाती है। इससे हमारी मेहनत कम हुई है और लागत में भी भारी कमी आई है। सेब के बागों में बड़ी मशीनों का इस्तेमाल मुश्किल होता है क्योंकि पौधों के बीच की दूरी कम होती है और रास्ते सँकरे। किसानक्राफ्ट के छोटे पावर टीलर और वीडर न केवल सेब के बगीचों की जुताई में काम आ रहे हैं बल्कि किसानों को बगीचे की खाली ज़मीन में सब्जियाँ और दालें बोने की सुविधा दे रहे हैं। यह पहाड़ी किसानों के लिए अतिरिक्त आय का बड़ा स्रोत बन गया है। शिमला जिला के सेब बागवान रोहित शर्मा बताते हैं कि पहले सेब के बगीचे के बीच खाली जमीन खाली ही रह जाती थी क्योंकि बड़ी मशीनें वहाँ नहीं पहुँच पाती थीं। पर छोटे टीलर की वजह से हम वहाँ सब्जी की खेती भी करने लगे। अब सेब के साथ आलू और फ्रेंच बीन्स उगाकर हमारी आमदनी दोगुनी हो गई है। कंपनी के संस्थापक रविंद्र अग्रवाल कहते हैं—“हमने एक ही लक्ष्य के साथ शुरुआत की थी, किसानों तक किफायती और प्रभावी उपकरण पहुँचाने के लिए। आने वाले समय में हमारा विज़न भारत को छोटे कृषि उपकरणों का वैश्विक हब बनाने का है। हम भारत की 20 प्रमुख फसलों के लिए एंड-टू-एंड मैकेनाइज़ेशन सॉल्यूशंस देंगे और दुनिया भर के किसानों तक अपनी मशीनरी पहुँचाएंगे।” दरअसल, किसानक्राफ्ट की यह यात्रा न सिर्फ एक कंपनी की सफलता की गाथा है, बल्कि लाखों किसानों की बदलती ज़िंदगी की भी कहानी है। पहाड़ों से लेकर मैदानों और कोल्ड डेजर्ट तक, किसानों को सशक्त बनाने की यह पहल भारतीय कृषि में एक नए युग की शुरुआत कर रही है। Post navigation Except for Salt, He Buys Nothing: Inside a Himachal Farmer’s Experiment in Self-Reliance Family farming is… empowering women mountain farmers in India