By- रमन कान्त लाहौल-स्पीति। चंद्रा नदी के किनारे बसा सिस्सू, अटल टनल से निकलते ही लाहौल-स्पीति का पहला बड़ा पड़ाव है। कुछ साल पहले तक यह गांव मुख्यतः अपने शांत पहाड़ी जीवन, खेती और पशुपालन के लिए जाना जाता था। अब यहां पर्यटकों की भीड़ है। अक्टूबर 2020 में अटल टनल खुलने के बाद से यहाँ पर्यटन व्यवसाय ने रफ्तार पकड़ी है। रोजाना डेढ़ से 2000 गाड़ियां टनल से सिस्सू और मनाली की ओर रवाना हो रही हैं। पीक टूरिस्ट सीजन में तो रोजाना 5000 के आसपास गाड़ियों की टनल से आवाजाही हो रही है। नदी किनारे बनी कृत्रिम झील में बोटिंग होती है, युवा जिपलाइन चलाते हैं, ऑफ-रोड वाहन दौड़ते हैं और सैकड़ों पर्यटक हर दिन यहां रुकते हैं। मगर इस खूबसूरती के पीछे बसा एक अनदेखा खतरा सिस्सू गांव के लोगों को बेचैन कर रहा है। जब भी बारिश होती है तो रीता कटोच रात को कई बार उठकर बाहर झांकती हैं। सिस्सू गांव की इस महिला के घर से करीब 11 किलोमीटर ऊपर हिमालय की एक झील हर साल थोड़ी और बड़ी हो रही है। रीता कटोच कहती हैं- “मौसम साफ हो तब कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जब बारिशें शुरू होती हैं और रुकती नहीं, तब डर लगने लगता है।” लेकिन यही हमारा घर है और मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहती। सिस्सू गांव के ऊपर बर्फीली चोटियों के बीच 4,068 मीटर की ऊँचाई पर बनी घेपांग घट हिमनद झील जिसे स्थानीय लोग घेपन झील कहते हैं उसमें लगातार पानी बढ़ रहा है। झील का बढ़ता पानी और आकार लोगों एक बड़े खतरे की आहट दे रहा है। इसी बदलाव के चलते राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने इस झील को “अतिसंवेदनशील” श्रेणी में रखा है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि यदि ग्लेशियर झील फटने की घटना यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) हुई, तो सबसे पहला और सबसे बड़ा खतरा सिस्सू गांव पर होगा। अटल टनल की ओर से सिस्सू गांव का दृश्य लाहौल के रक्षक देवता घेपन के नाम पर बनी इस झील का स्थानीय संस्कृति और आस्था से गहरा रिश्ता है। झील की ओर ट्रैकिंग पर जाने वाले लोग आज भी सिस्सू स्थित घेपन देवता मंदिर में माथा टेकते हैं। लेकिन अब इस झील का नाम सिर्फ धार्मिक आस्था या रोमांचक ट्रैकिंग के कारण नहीं लिया जाता। यह अब गांव के लोगों की रोजमर्रा की बातचीत, चिंताओं और भविष्य के डर का हिस्सा बन चुकी है। नेशनल रिमोट सैंसिंग सैंटर (NRSC), हैदराबाद की जोखिम आकलन रिपोर्ट के अनुसार, झील के फटने की स्थिति में सबसे ज्यादा खतरा सिस्सू को होगा। है। इस रिपोर्ट में झील फटने की 8 स्थितियों का आकलन किया गया है और सभी 8 स्थितियों में सिस्सू गांव रेड जोन में है। रिपोर्ट बताती है कि झील और गांव के बीच तीखी ढलान है, जिससे पानी और मलबे की रफ्तार बेहद तेज हो सकती है। है। सिस्सू के बाद गोशाल, तांदी गांव ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्र में हैं। सबसे खराब स्थिति में झील फटने के केवल 21 मिनट के भीतर बाढ़ का पानी सिस्सू तक पहुंच सकता है। अनुमानों के अनुसार पानी की गति 43 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है और इसकी गहराई 20 मीटर तक पहुंच सकती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि बाढ़ की स्थिति में पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा, चट्टानें और ग्लेशियर से टूटे पत्थर भी नीचे आएंगे। इस संभावित बाढ़ की चपेट में 34 बस्तियां, 204 हेक्टेयर खेती योग्य जमीन, 57 पुल और 106 किलोमीटर सड़क आ सकती है। मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग, अटल टनल और पर्यटन से जुड़ा पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर भी खतरे की जद में होगा। रिपोर्ट के अनुसार, इस घटना का प्रभाव सिर्फ हिमाचल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि चिनाब नदी के जरिए जम्मू-कश्मीर तक देखने को मिल सकता है। NRSC ने उपग्रह तस्वीरों और मॉडलिंग की मदद से संभावित बाढ़ क्षेत्र के नक्शे तैयार किए हैं। इनमें भवनों, खेतों, पुलों और बिजली परियोजनाओं तक को चिन्हित किया गया है। लेकिन गांव के लोगों के लिए यह खतरा किसी वैज्ञानिक दस्तावेज का हिस्सा भर नहीं रह गया है। घेपन झील को लेकर सबसे बड़ी चिंता सिर्फ उसका लगातार बढ़ता आकार नहीं है, बल्कि यह भी है कि इतने वर्षों से वैज्ञानिक चेतावनियों, सैटेलाइट निगरानी और विस्तृत जोखिम आकलन रिपोर्टों के बावजूद जमीनी स्तर पर इससे निपटने की तैयारी बेहद कमजोर दिखती है। झील पर वर्तमान में कोई अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं लगा है। हालांकि NDMA, Central Water Commission, NCPOR समेत कई संस्थाएं साथ मिलकर काम कर रही हैं और सिस्सू की कृत्रिम झील पर प्रगत संगणक विकास केंद्र (C-DAC) द्वारा विकसित एक पायलट सिस्टम लगाया गया है लेकिन यह अभी टेस्टिंग फेज में है। इस पायलट सिस्टम में तापमान, हवा, दबाव और वर्षा मापने वाले सेंसर के साथ कैमरा और सेटेलाइट आधारित अलर्ट मैकेनिज्म लगा हुआ है। मगर अभी यह सिस्सू गांव से नीचे ही टेस्ट किया जा रहा है। सिस्सू गांव की कृत्रिम झील पर लगे अर्ली वार्निंग सिस्टम को जांचते हुए एक्सपर्ट दूसरा महत्वपूर्ण पहलु यह है कि सिस्सू और आसपास के इलाकों में ऐसे सार्वजनिक चेतावनी बोर्ड, सायरन सिस्टम, स्पष्ट निकासी मार्ग और रियल-टाइम अलर्ट तंत्र दिखाई नहीं देते, जो आपदा की स्थिति में लोगों को तुरंत सतर्क कर सकें। सिस्सू में रहने वाले लोग इस खतरे के साथ जीना सीख रहे हैं। उनके भीतर डर के साथ एक तरह का भरोसा भी कि शायद कुछ नहीं होगा। चंद्रा नदी किनारे पर्यटकों के लिए जिपलाइन और बोटिंग जैसी गतिविधियां चलाने वाले जितेंद्र कुमार जिनकी रोज़ी-रोटी पर्यटन से चलती है कहते हैं- “पिछले एक-दो साल से यह बात ज्यादा फैल गई है कि झील कभी भी फट सकती है। डर तो रहता है, लेकिन काम भी करना है। इसके अलावा हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है।” उनकी बातों में भय और मजबूरी दोनों झलकते हैं। सिस्सू में पर्यटन ने युवाओं को रोजगार का मौका दिया है। कई लोगों ने खेती के साथ होम-स्टे, कैफे और एडवेंचर गतिविधियों का काम शुरू कर दिया है। लेकिन वही पर्यटन अब जलवायु और पर्यावरण पर दबाव बढ़ाता दिखता है। सिस्सू के ही कमल जो 2024 में घेपन झील तक गए थे वह खतरे को लेकर उतने आशंकित नहीं हैं। कमल कहते हैं- “झील बहुत ऊपर है। वहां तक पहुंचना आसान नहीं है। अपनी बात जारी रखते हुए बह बताते हैं- “मैंने देखा कि झील से लगातार पानी निकल रहा है और नीचे सिस्सू नाले में आ रहा है। मुझे नहीं लगता कि झील फटेगी।” स्थानीय स्तर पर दो तरह की सोच दिखाई देती है। एक तरफ वैज्ञानिक चेतावनियां हैं और दूसरी तरफ लोगों का वर्षों का अनुभव है जिन्होंने यहां अपनी जिंदगी के कई दशक बिता दिए हैं। लेकिन विशेषज्ञ इस खतरे को गंभीर मानते हैं। घेपन झील एक मोरेन-डैम्ड ग्लेशियल लेक है यानी यह झील ग्लेशियर के पीछे हटने के बाद जमा हुए पत्थरों, रेत और मलबे से बने प्राकृतिक बांध के पीछे बनी है। यह बांध काफी कमजोर माना जाता है। भारी बारिश, भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियर से बड़े हिस्से के टूटकर झील में गिरने जैसी घटनाएं इस बांध को अचानक तोड़ सकती हैं। ऐसी स्थिति में पानी धीरे-धीरे नहीं निकलेगा, बल्कि मलबे और चट्टानों के साथ तेज सैलाब की तरह नीचे उतरेगा। सिस्सू नाला जहां से बहकर झील का पानी चंद्रा नदी में मिलता है NRSC की रिपोर्ट के अनुसार, 1989 में घेपन झील का क्षेत्रफल 36.49 हेक्टेयर था। 2022 तक यह बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया। यानी तीन दशकों में झील का आकार लगभग तीन गुना हो चुका है। जर्नल ऑफ ग्लेशियोलॉजी में प्रकाशित शोध Mass balance of lake-terminating Gepang Gath glacier, western Himalaya, India and the role of glacier-lake interactions के अनुसार, 2015 से 2023 के बीच घेपन ग्लेशियर का मास बैलेंस लगातार नकारात्मक (-0.90 मीटर वॉटर इक्विवलेंट प्रति वर्ष) रहा। आसान भाषा में कहें तो हर साल जितनी बर्फ जमा हो रही है, उससे कहीं ज्यादा पिघल रही है। अध्ययन बताता है कि 1962 के बाद से घेपन ग्लेशियर लगभग 2.76 किलोमीटर पीछे हट चुका है और औसतन 53 मीटर प्रति वर्ष की दर से सिकुड़ रहा है। अध्ययन के सह-लेखक और राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र (NCPOR) के ग्लेशियोलॉजिस्ट भानु प्रताप कहते हैं: “पिछले 30-40 वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों का तापमान तेजी से बढ़ा है। पहले जहां ज्यादा बर्फबारी होती थी, अब बारिश बढ़ रही है। बारिश ग्लेशियरों को बर्फ से कहीं ज्यादा तेजी से पिघलाती है। यह एक क्युमुलेटिव प्रोसेस है, जो एक बार शुरू हो जाए तो लगातार बढ़ती जाती है।” भानु प्रताप के अनुसार, ग्लेशियरों के सिकुड़ने के पीछे सिर्फ तापमान वृद्धि नहीं बल्कि वर्षा के स्वरूप में बदलाव भी एक बड़ा कारण है। “पहले ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ज्यादातर बर्फ गिरती थी। अब वहां बारिश हो रही है। बारिश सीधे ग्लेशियर की सतह पर असर डालती है और पिघलने की गति बढ़ाती है। इसका असर सिर्फ एक ग्लेशियर पर नहीं, पूरे हिमालयी क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है।” विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियर के पिघलने और झील के फैलने की प्रक्रिया एक-दूसरे को और तेज कर रही है। जैसे-जैसे झील का पानी बढ़ता है, वह ग्लेशियर के निचले हिस्से को अधिक तेजी से पिघलाता है। इससे बर्फ के बड़े हिस्से टूटकर झील में गिरते हैं और झील का आकार और बढ़ता जाता है। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि लाहौल-स्पीति का मौसम तेजी से बदल रहा है। 1971-2000 के औसत तापमान, बारिश और हाल के वर्षों के आंकड़ों की तुलना करें तो मार्च और अप्रैल के महीने पहले की तुलना में काफी गर्म हो चुके हैं। अप्रैल में तापमान 24.8 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया है, जबकि पहले यह स्तर मई या जून में पहुंचता था। फरवरी और मार्च भी अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा गर्म हैं। इसका असर सिर्फ ग्लेशियरों तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोग खेती, जल स्रोतों और बर्फबारी के पैटर्न में भी बदलाव महसूस कर रहे हैं। कमल कहते हैं, “टनल खुलने के बाद यहां बर्फ कम गिर रही है। पहले सर्दियां ज्यादा लंबी हुआ करती थीं। अब मौसम बदल गया है।” गांव के प्रवेश द्वार पर लगे पेड़ों की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं, “पहले पेड़ों की पत्तियां हरे से पीली होती थीं, अब सीधे काली होकर गिर जाती हैं।” लाहौल घाटी की जलवायु में आ रहे बदलाव के बारे में बताते सिस्सू गांव के कमल हालांकि वैज्ञानिक सीधे तौर पर इन बदलावों को केवल पर्यटन या वाहनों से जोड़ने से बचते हैं, लेकिन उनका मानना है कि स्थानीय स्तर पर बढ़ती गतिविधियां भी पर्यावरणीय दबाव बढ़ाती हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विजिटिंग प्रोफेसर और वरिष्ठ ग्लेशियोलॉजिस्ट अनिल कुलकर्णी कहते हैं: “मैं 1987 में छोटा शिगरी ग्लेशियर अभियान के दौरान यहां आया था। तब सिस्सू में मुश्किल से एक गेस्ट हाउस था। महीनों तक कोई आदमी दिखाई नहीं देता था। अब यहां भारी भीड़ है।” कुलकर्णी बताते हैं कि हिमालय जैसे नाजुक क्षेत्रों में मानव गतिविधियों का असर लंबे समय में गंभीर हो सकता है। “वाहनों से उठने वाली धूल बर्फ की सतह पर जम जाती है। इससे बर्फ की परावर्तन क्षमता कम होती है और वह ज्यादा गर्मी सोखने लगती है। परिणामस्वरूप पिघलने की रफ्तार बढ़ जाती है।” वह कहते हैं कि केवल ग्लेशियरों का पिघलना ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि तेजी से बढ़ता निर्माण भी खतरे को बढ़ा रहा है। “पहाड़ों में निर्माण गतिविधियां बहुत बढ़ी हैं। अगर झील फटती है तो सिर्फ पानी नहीं आएगा। मलबा, चट्टानें और पेड़ सब साथ आएंगे। इस तरह की घटनाओं में कैस्केडिंग इफेक्ट होता है, जिससे तबाही कई गुना बढ़ जाती है।” चंद्रा नदी के किनारे बढ़ता पर्यटन कारोबार घेपन झील की कहानी अकेली नहीं है। यह पूरे हिमालय में हो रहे बड़े बदलावों की एक झलक है। नेपाल स्थित अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के अनुसार, 1990 से 2020 के बीच हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत ग्लेशियर क्षेत्रफल खत्म हो चुका है। पश्चिमी हिमालय में भी ग्लेशियर क्षेत्रफल 8,964 से सिकुड़कर 7,878 वर्ग किलोमीटर रह गया है। चिनाब उप-बेसिन जहाँ घेपांग झील स्थित है, वहां बड़े ग्लेशियर पिघलकर कई छोटे टुकड़ों में बँट रहे हैं, जिससे नई झीलों की संख्या बढ़ रही है। ये बदलाव हिमालय की तलहटी में बसे समुदायों के लिए बड़ा खतरा हैं। वर्ल्ड ग्लेशियर मॉनिटरिंग सर्विस (WGMS) के 2025 के अनुमानों के अनुसार ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका को छोड़ दें, तो दुनिया के ग्लेशियरों ने 2025 में 408 गीगाटन बर्फ खो दी है। शोध के प्रमुख लेखक माइकल ज़ेम्प कहते हैं कि जितनी बर्फ कम हुई है उससे हर एक सेकंड में पाँच ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भरे जा सकते थे। ज़ेम्प के अनुसार हिमालय, रूस और अलास्का के साथ संयुक्त रूप से उन क्षेत्रों में है जहां ग्लेशियरों का क्षरण तेजी से हो रहा है। केंद्रीय जल आयोग की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ग्लेशियल झीलों का कुल क्षेत्रफल 2011 की तुलना में लगभग 29 प्रतिशत बढ़ा है। वहीं हिमाचल प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 बताती है कि राज्य में 2016 में 805 ग्लेशियल झीलें थीं, जो 2022 तक बढ़कर 1,619 हो गईं। यानी सिर्फ छह वर्षों में इनकी संख्या लगभग दोगुनी हो गई। राज्य में स्नोकवर भी लगातार घट रहा है। 2023-24 की सर्दियों में हिमाचल में स्नो कवर पिछले वर्ष की तुलना में 13 प्रतिशत कम दर्ज किया गया। सिस्सू और आसपास के गांवों में लोगों को झील से जुड़े खतरे की जानकारी है। गांवों में वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और प्रशासनिक टीमों की आवाजाही बढ़ी है। सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप समूहों में भी इस पर चर्चाएं होती रहती हैं। गोशाल गांव के विपिन कहते हैं, “लोगों को पता है कि ऊपर झील है और खतरा भी है। यहां अक्सर रिसर्च करने वाले लोग आते रहते हैं।” चंद्रा नदी के ऊपर बना पुल जो गोशाल गांव को मुख्य सड़क से जोड़ता है सिस्सू पंचायत के प्रधान राजीव बताते हैं कि प्रशासन हर साल मॉक ड्रिल करवाता है और सुरक्षित स्थानों की पहचान की गई है। लेकिन गांव के लोगों के भीतर एक और डर भी मौजूद है — विस्थापन का डर। हालांकि वे खुलकर इस पर ज्यादा बात नहीं करते, लेकिन उन्हें लिंडूर गांव का उदाहरण याद है, जहां धंसाव के बाद प्रभावित परिवार अभी तक स्थायी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। “अगर कभी पानी सब कुछ बहा ले गया तो हमारा क्या होगा?” यह सवाल गांव के लोगों की चुप्पी में बसा हुआ है। हिंदूकुश हिमालय में नेपाल की त्सो रोल्पा झील को हिमालय में GLOF प्रबंधन के सफल उदाहरण के रूप में देखा जाता है। वहां अर्ली वार्निंग सिस्टम और नियमित मॉक ड्रिल के कारण 2016 में बढ़े जलस्तर के दौरान लोगों को सुरक्षित निकाला जा सका था। मगर अभी यहां कोई भी इस तरह का सिस्टम नहीं है जो नुकसान को कम करने में मददगार हो। सिस्सू आने वाले हजारों पर्यटक झील, नदी और बर्फीले पहाड़ों की तस्वीरें लेकर लौट जाते हैं। लेकिन उनमें से अधिकतर को यह अंदाजा भी नहीं होता कि इन्हीं पहाड़ों के पीछे एक झील हर साल थोड़ी और बड़ी हो रही है। रीता अब भी हर बारिश में डरती हैं। जितेंद्र रोज़ काम पर जाते हैं। कमल अब भी मानते हैं कि शायद कुछ नहीं होगा। लेकिन बदलती जलवायु ने हिमालय के इस शांत गांव में एक स्थायी बेचैनी जरूर छोड़ दी है — एक ऐसा डर, जो फिलहाल दिखाई नहीं देता, लेकिन लगातार बढ़ रहा है। Post navigation Manali Strays Giving Hope to Thousands of Stray Animals in the Himalayas