लेखक- रमन कान्त

शिमला। हिमाचल प्रदेश जैसे अति-संवेदनशील, पर्वतीय और कठिन कृषि-भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में जलवायु परिवर्तन किसानों की रोज़मर्रा जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। सीधे-सीधे “क्लाइमेट चेंज” जैसे शब्द को न जानने वाले किसान भी अनजाने में ही सही, लेकिन उसी तरह की खेती की ओर बढ़ रहे हैं, जिस सतत खेती को अपनाने की बात वैज्ञानिक कर रहे हैं। मौसम का बदलता मिज़ाज, अनिश्चित बारिश, बढ़ती बीमारियां और उत्पादन का जोखिम—ये सब अब हिमाचल के किसान के अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में खेती को जलवायु के साथ अनुकूल बनाने की कोशिशें सिर्फ नीतियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खेतों में भी दिखाई देने लगी हैं।

खेती के भविष्य को बचाने और खेती को सतत बनाने के लिए हिमाचल सरकार प्राकृतिक खेती पर मुहिम चला रही है। राजीव गांधी प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत राज्य में प्राकृतिक खेती को प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है। कृषि विभाग, हिमाचल प्रदेश के आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल 9.97 लाख किसान हैं, जिनमें से 2.23 लाख किसान (22.37%) 38456 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।

कम लागत और फसलों का मौसम की मार झेलना कर रहा किसानों को आकर्षित

शिमला जिले की पाहल पंचायत में 6 बीघा जमीन पर खेती करने वाले किसान सुरेश ठाकुर कहते हैं, “पिछले चार महीनों से हमारे यहां बारिश की एक बूंद भी नहीं पड़ी है, फिर भी मैं चिंतामुक्त हूँ।” पिछले आठ वर्षों से प्राकृतिक खेती कर रहे सुरेश आगे कहते हैं कि यह चिंता से मुक्ति किसी एक मौसम में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे समय के साथ आई है। पहले जब मौसम साथ नहीं देता था, तो उनके मन में भी अन्य किसानों की तरह नुकसान का डर हर वक्त बना रहता था। मगर अब उन्हें विश्वास है कि यदि नुकसान की नौबत भी आई, तो भी वह सीमित होगा—क्योंकि एक तो मेरी लागत कम है और दूसरी मेरी फसलें मौसम की मार को बेहतर तरीके से झेलने में सक्षम हैं।

अपने खेत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “मिट्टी अब नरम है, फसलों में बीमारी लगने की संभावना कम है, और मुझे सूखे और अधिक बारिश दोनों में अच्छी पैदावार मिल रही है।”

सुरेश ठाकुर इसका श्रेय मुख्य रूप से ‘आच्छादन’ (mulching) यानी खेत की मिट्टी को फसल अवशेषों, सूखी घास या पत्तियों से ढकने को देते हैं। सूखे के दौरान, यह आच्छादन परत वाष्पीकरण को कम करती है और मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद करती है। जब बारिश तेज होती है, तो यह बूंदों के प्रभाव को कम करती है और सतही अपवाह को धीमा कर देती है, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है। देसी बीजों का उपयोग करके वह सब्जियों, अनाज और दालों की मिश्रित खेती करते हैं जिससे जोखिम कम हो जाता है। प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद से ठाकुर की इनपुट लागत 45,000 रुपये से घटकर 5,500 रुपये रह गई है। उन्होंने बताया कि उनकी आय 3 लाख रुपये से बढ़कर 4.5 लाख रुपये हो गई है।

यह कहानी सिर्फ सुरेश तक सीमित नहीं है। प्रदेश के हजारों किसान-बागवानों के अनुभव कमोबेश इसी तरह के हैं। ऊना जिले में 12.5 बीघा जमीन पर खेती करने वाले किसान जोगिंदर पाल कहते हैं- मैं मैदानी इलाके में रहता हूं, यहां बारिश के दिनों में खेतों में जलभराव आम बात है। “पिछले साल बारिश के दौरान सबके खेत पानी से भर गए। नमी ज्यादा होने के कारण आसपास के किसानों की मक्की की फसल पूरी तरह खराब हो गई, लेकिन मुझे उतना नुकसान नहीं हुआ।” उनका अनुभव भी इसी ओर इशारा करता है कि खेती की पद्धति बदलने से जोखिम को कुछ हद तक काबू में किया जा सकता है।

जोगिंदर ने बताया कि प्राकृतिक खेती से मिट्टी की सरंध्रता (porosity) में सुधार होता है, जिससे पानी सतह पर रुकने के बजाय जमीन में रिस जाता है। मल्चिंग से जड़ों की रक्षा होती है और मिट्टी के संघनन (compaction) में कमी आती है। उन्होंने बताया कि बाढ़ के दौरान आस-पास के किसानों को उनकी मक्की की फसल में 90% तक का नुकसान हुआ, जबकि उनकी आधी से अधिक फसल बरकरार रही। एक फसल में हुए नुकसान की भरपाई आंशिक रूप से साथ में लगी मिश्रित फसलों से हो गई।

जलवायु परिवर्तन का बढ़ता दबाव

आईपीसीसी की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि से कृषि क्षेत्र पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट का चैप्टर 10-एशिया का भाग 10.4.5 फूड एंड एग्रीकल्चर कहता है कि एशिया महाद्वीप में भारत अति-संवेदनशील देशों में शामिल है और यहां फसल उत्पादन पर संकट और गहरा सकता है। आईपीसीसी-एआर5 के बाद के अध्ययनों के आधार पर एशिया के उप-क्षेत्रों में कृषि और खाद्य प्रणालियों पर जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभाव का आकलन कहता है कि वर्ष 2030 तक भारत में चावल, गेहूं और दालों जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में लगभग 2.3 प्रतिशत की कमी आ सकती है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा बनाए रखने और किसानों की आय को बचाने के लिए खेती और कृषि प्रणालियों को सतत और जलवायु-अनुकूल बनाना और भी जरूरी हो जाता है।

क्या प्राकृतिक खेती और जैविक खेती एक ही है?

प्राकृतिक खेती और जैविक खेती के बीच रेखाएं धुंधली लग सकती हैं, हालांकि इनमें कुछ अंतर हैं। चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर में कृषि अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. मनोज गुप्ता ने कहा, ” दोनों विधियां रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को खत्म करती  हैं।  प्राकृतिक खेती में किसान गाय के गोबर और मूत्र का उपयोग करके सभी फॉर्मूलेशन अपने खेत पर न्यूनतम लागत पर तैयार करता है, जबकि जैविक खेती में बाजार पर उसकी निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं होती है।” उन्होंने आगे कहा कि प्राकृतिक खेती जैविक खेती का एक बेहतर संस्करण है।

हिमाचल जिस प्राकृतिक खेती को अपना रहा है वह महाराष्ट्र से संबंध रखने वाले पद्मश्री सुभाष पालेकर द्वारा विकसित खेती विधि है। इसे शून्य लागत प्राकृतिक खेती और सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के नाम से भी जाना जाता है लेकिन हिमाचल में ज्यादातर किसान इसे प्राकृतिक खेती के तौर पर जानते हैं। प्राकृतिक खेती में रसायनों की बजाए देसी गाय के गोबर, मूत्र और स्थानीय संसाधनों से निर्मित आदानों का खेती में प्रयोग किया जाता है।

इस खेती का मूल सिद्धांत है- मिट्टी सजीव है और उसमें मौजूद सूक्ष्मजीव, केंचुए, जैविक पदार्थ और प्राकृतिक तत्व फसलों के लिए पोषण और संरक्षण प्रदान कर सकते हैं। किसान को केवल इन्हें सक्रिय करना होता है, न कि बाहर से रसायन डालकर उन्हें नुकसान पहुंचाना। इस विधि में गाय के गोबर और गौमूत्र के साथ स्थानीय संसाधनों से तैयार जीवामृत (गाय के गोबर, मूत्र, पानी, बेसन, गुड़ और मिट्टी के मिश्रण से बना घोल), घनजीवामृत (उर्वरक के रूप में जीवामृत का ही ठोस रूप), बीजामृत (गाय के गोबर, मूत्र, पानी, मिट्टी और चूना मिश्रित घोल), नीमास्त्र (गाय का गोबर, मूत्र, पानी और नीम के पत्ते से बना घोल), ब्रह्मास्त्र (गोमूत्र, आम, अमरूद या अरंडी में से किन्ही दो के पत्तों की चटना से बना घोल), अग्निअस्त्र (गोमूत्र, कड़वे पत्ते, पाउडर, हरी मिर्च और लहसुन की चटनी से निर्मित घोल) और दशपर्णी अर्क (गोबर, गोमूत्र, पानी, दस तरह के कड़वे पत्ते जिन्हें पशु न खाएं और हरी मिर्च, हल्दी, अदरक, हींग तथा लहसुन की चटनी के किण्वन से बना घोल) जैसे फॉर्मूलेशन का इस्तेमाल किया जाता है।

देसी गाय: प्राकृतिक खेती की बुनियाद

देसी गाय प्राकृतिक खेती की पहली और बुनियादी जरूरत है। हिमाचल सरकार देसी गाय की खरीद पर किसानों को 30000 रूपए (25,000 रुपये अनुदान और 5,000 रुपये बाजार शुल्क सहायता) की सहायता प्रदान करती है। अब तक, 2,268 किसानों ने इस सब्सिडी का लाभ उठाया है। लाभार्थियों को स्थानीय पहाड़ी गाय, साहीवाल या गिर जैसी देशी नस्लों की खरीद पर ही यह सहायता राशि दी जाती है। किसानों की सहूलियत के लिए विभाग ने कुछ नस्लों की खरीद के लिए विशिष्ट फार्मों को चिह्नित किया है।

इसके अलावा, 1,379 प्रशिक्षित किसानों ने संसाधन केंद्र खोले हैं जो जीवामृत और बीजामृत जैसे इनपुट न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध कराते हैं। जो किसान गाय पालना नहीं चाहते, वे इन केंद्रों से इनपुट प्राप्त कर सकते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शोध के निष्कर्ष

हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2018 से प्राकृतिक खेती पर योजना की शुरूआत की गई है। योजना के कार्यान्वयन में प्रधान वैज्ञानिक के तौर पर जुड़े चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के कृषि अर्थशास्त्र विषय के प्रोफेसर डॉ. मनोज गुप्ता कहते हैं- “जब प्रदेश में प्राकृतिक खेती विधि को अपनाने की शुरुआत हो रही थी, तो यह संशय था कि हिमाचल जैसे डायवर्स एग्रो-इकोलॉजी वाले राज्य में यह विधि कैसे काम कर पाएगी। इसके ऊपर विस्तृत अनुसंधान के लिए हमने प्रदेश के कृषि और वानिकी विश्वविद्यालयों को रिसर्च प्रोजेक्ट दिए।”

धान, गेहूं-मटर, चना, मक्का-सोयाबीन और मंडुआ-सोयाबीन फसल संयोजनों पर किए गए अध्ययनों से पता चला कि जीवामृत का कम अंतराल पर प्रयोग करने से उपज अधिक होती है, इसलिए जीवामृत (गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़ आदि से बना) लगाने के अंतराल को 21 दिनों से घटाकर 14 दिन कर दिया गया। घनजीवामृत (गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़ से भी बना लेकिन अलग अनुपात में) के प्रयोग से मृदा कार्बनिक कार्बन और नाइट्रोजन बढ़ता पाया गया, जो मिट्टी की उर्वरता के प्रमुख संकेतक हैं।

प्राकृतिक खेती के प्रभाव

ग्लोबल एलांयस फॉर फ्यूचर ऑफ फूड द्वारा समर्थित जिस्ट इंपैक्ट की रिपोर्ट Natural Farming through a wide lens कहती है कि वर्तमान खाद्य प्रणालियों की तुलना में प्राकृतिक खेती अधिक जलवायु-अनुकूल है। यह सूखे और पानी की कमी जैसी समस्याओं से निपटने में मदद करती है। रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों की लागत में 44% तक कमी आई और इसके फलस्वरूप उनकी आय में 49% की वृद्धि दर्ज की गई।

एकेडमी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज लखनऊ द्वारा हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती से किसानों की आर्थिकी पर आए प्रभाव का आकलन कहता है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से खेती की लागत में औसतन 36% की कमी आई और किसानों का शुद्ध लाभ 28.6% तक बढ़ा है। हिमाचल के मैदानी इलाकों के साथ-साथ पहाड़ी इलाकों में भी इस विधि पर शोध किए गए। शीत मरुस्थल के रूप में पहचानी जाने वाली स्पीति घाटी जहां सर्दियों में तापमान -25 से -30 डिग्री और गर्मियों में 32 डिग्री तक चला जाता है वहां सेब उत्पादन पर 2018 से 2022 के बीच विस्तृत अध्ययन किया गया। इस शोध में पाया गया कि प्राकृतिक खेती और आच्छादन (जमीन की सतह को घास, पत्तों या फसल अवशेषों से ढकना) अपनाने से पारंपरिक खेती की तुलना में मिट्टी में 4 से 8 प्रतिशत अधिक नमी बनी रही।

शोध से जुड़े डॉ. वाई.एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के वैज्ञानिक डॉ. सुधीर वर्मा के अनुसार, अप्रैल से सितंबर के बीच चलने वाले एकमात्र फसल सीजन में मिट्टी की नमी लगातार बनी रही और आच्छादन से मिट्टी का तापमान भी कम रहा। क्षेत्र की रेतीली और कंकड़ वाली मिट्टी में भी ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक पाई गई। 1500 मीटर से कम ऊंचाई पर प्राकृतिक खेती में मिट्टी का औसत ऑर्गेनिक कार्बन 1.54 प्रतिशत रहा, जबकि पारंपरिक खेती में यह 1.17 प्रतिशत था। 2000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर यह आंकड़े क्रमशः 1.55 और 1.49 प्रतिशत दर्ज किए गए।

सेब उत्पादन करने वाले छह जिलों—शिमला, मंडी, किन्नौर, कुल्लू, लाहौल-स्पीति और चंबा—में भी यही रुझान सामने आया। यहां प्राकृतिक खेती अपनाने से मिट्टी में सॉयल ऑर्गेनिक कार्बन की औसत वैल्यू 1.79 प्रतिशत रही, जबकि पारंपरिक खेती में यह 1.71 प्रतिशत दर्ज की गई।

चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर में प्राकृतिक और जैविक खेती विभाग के अध्यक्ष डॉ. जनार्दन सिंह कहते हैं कि प्राकृतिक खेती 100 प्रतिशत क्लाइमेट रेजिलिएंट खेती पद्धति है। इसमें रासायनों का प्रयोग नहीं किया जाता, जिससे कृषि उर्वरकों और कीटनाशकों से होने वाला ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है—जो ग्लोबल वार्मिंग का एक बड़ा कारण है। जनार्दन आगे कहते हैं कि हिमाचल प्रदेश में मौसमी बदलावों से खेती में बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है और सीमित संसाधनों में कृषि करना लगातार कठिन होता जा रहा है। ऐसे में किसान की आजीविका और खेती को लंबे समय तक बचाने के लिए प्राकृतिक खेती एक व्यवहारिक विकल्प बनकर उभर रही है।

आंध्र प्रदेश से कैसे अलग हैं हिमाचल के प्रयास

हिमाचल ने प्राकृतिक खेती को आंध्र प्रदेश के बाद बड़े पैमाने पर अपनाया है। हालांकि दोनों राज्यों में इस पद्धति के क्रियान्वयन में कुछ बुनियादी अंतर हैं। जहां आंध्र प्रदेश ने इसके लिए राज्य के बजट के साथ जर्मनी के KfW बैंक से 1745 करोड़ रुपये का ऋण लिया है, वहीं हिमाचल सरकार इसे पूरी तरह राज्य के खजाने से चला रही है। वर्ष 2018 से 2025-26 तक इसके लिए लगभग 142 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। आंध्र प्रदेश जहां मुख्य रूप से इसके दायरे को बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है, वहीं हिमाचल ने स्वप्रमाणीकरण प्रणाली CETARA-NF और प्राकृतिक खेती आधारित सतत खाद्य प्रणाली (Suspnf) विकसित करने जैसे संस्थागत नवाचार भी किए हैं।

जो किसान प्राकृतिक खेती से फसलें उगा रहे हैं उन्हें आर्थिक सुरक्षा देने के लिए हिमाचल सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद कर रही है। अभी तक प्रदेश सरकार प्राकृतिक खेती से उत्पादित फसलों- गेहूं, मक्का, कच्ची हल्दी और जौ की खरीद पर किसानों को 3.60 करोड़ का भुगतान कर चुकी है। इस पूरी व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए प्रदेश सरकार ने शराब की बिक्री पर प्राकृतिक खेती सेस भी लगाया है—देसी शराब पर प्रति बोतल 2 रुपये और अंग्रेजी व विदेशी शराब पर 5 रुपये प्रति बोतल। प्राकृतिक खेती उत्पादों के लिए सरकार ने “हिम-भोग” ब्रांड की भी शुरूआत की है जिसके अधीन उत्पादों को बेचा जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू कहते हैं- “हमने किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए मक्का, गेहूं, कच्ची हल्दी और जौ जैसी नेचुरल रूप से उगाई जाने वाली फसलों के लिए देश में सबसे ज़्यादा MSP शुरू किया है। हम और फसलों को MSP के तहत लाने की योजना बना रहे हैं। जब किसानों को अच्छे दाम मिलेंगे, तो वे निश्चित रूप से इसे अपनाने में दिलचस्पी दिखाएंगे।”

IFOAM-Organics के पूर्व एकेडमी मैनेजर आशीष गुप्ता मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल को आंध्र प्रदेश जितनी मान्यता न मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है। उनके अनुसार, हिमाचल द्वारा प्राकृतिक खेती आधारित सतत खाद्य प्रणाली का विकास एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन बाजार को बदलने में समय लगता है और इस समय के दौरान किसानों को सहारे की जरूरत होती है जिसके लिए प्रदेश सरकार खुद किसानों से खरीद कर रही है।

राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली के फेलो और पॉलिसी रिसर्चर युवराज कालिया भी हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा किसानों से सीधे खरीद को बड़ा कदम मानते हैं। वह कहते हैं- प्रदेश सरकार द्वारा गेहूं, मक्का, जौ और हल्दी जैसे प्राकृतिक उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का फैसला गेम-चेंजर है। यह टिकाऊ खेती की ओर बढ़ते प्रयासों को जरूरी गति देता है, हालांकि प्रमाणीकरण, मार्केट लिंकेज और विपणन तंत्र को और मजबूत करने की दिशा में और काम करने की जरूरत है।

क्या हैं प्रमुख चुनौतियां

हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक खेती को अपना प्रमुख कार्यक्रम बनाया है लेकिन इसमें अभी कई चुनौतियां हैं।

बीजों की समस्या

प्रदेश में प्राकृतिक खेती से जुड़े किसान पुराने और नए बीजों का मिलाजुला प्रयोग कर रहे हैं। किसान विभाग, बाजार और पुराने किसानों से बीज खरीद कर उसका प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन राज्य में कृषि भौगोलिक विविधता के हिसाब से एक व्यवस्थित सीड बैंक नहीं है जहां से किसानों को बीज मिल सकें।

रिवाइटलाइजिंग रेनफेड एग्रीकल्चर (RRA) के हिमाचल चैप्टर से जुड़े मंडी जिला के किसान सोमकृष्ण गौतम ने बताया कि 2018 में उन्होंने बीज बचाओ अभियान के तहत पुराने बीजों को संरक्षित करना शुरू किया और आज उनके पास अनाज, दलहन, तिलहन फसलों तथा मोटे अनाजों की 120 किस्मों के बीज हैं। उनके साथ 6 जिलों के 500 किसान जुड़े हैं जो पुराने बीजों के संरक्षण और संवर्धन तथा अन्य किसानों को बीज उपलब्ध करवाने का काम कर रहे हैं।

श्रम की अधिक आवश्यकता

किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं लेकिन प्राकृतिक खेती में श्रम की भारी आवश्यकता है जिसके चलते उनमें थोड़ी हिचकिचाहट भी दिखती है। आंध्र प्रदेश में ग्लोबल एलांयस फॉर फ्यूचर ऑफ फूड द्वारा समर्थित जिस्ट इंपैक्ट की रिपोर्ट Natural Farming through a wide lens के अनुसार प्राकृतिक खेती में पारंपरिक खेती के मुकाबले ज्यादा श्रम की जरूरत पड़ती है। रिपोर्ट की पेज संख्या 55, Impact on on-farm labour स्पष्टता से बताती है कि जहां पारंपरिक खेती में हर वर्ष 277 घंटे श्रम की जरूरत पड़ी वहीं प्राकृतिक खेती में 336 घंटे (21% अधिक) श्रम की जरूरत पड़ी। हिमाचल प्रदेश में राज्य परियोजना कार्यान्वयन इकाई द्वारा करवाए किए गए अध्ययन भी कहते हैं कि प्राकृतिक खेती में लगभग 20 प्रतिशित अधिक श्रम की जरूरत रहती है।

प्राकृतिक खेती में ज्यादा श्रम क्यों लगता है, 12.5 बीघा में खेती कर रहे ऊना जिला के किसान जोगिंदर पाल उदाहरण देकर समझाते हैं- मान लीजिए मैं प्राकृतिक खेती में गोभी की फसल लेता हूं। पहले खेत तैयार करने के लिए जीवामृत और घनजीवामृत डालना पड़ता है। गोभी के बीजों को बीजामृत से संस्कारित करके फिर उन्हें रोपना, मिट्टी की सतह को घास-फूस या पत्तों (मल्चिंग) से ढकना होता है। इसके बाद जब खेतों में खरपतवार आते हैं तो उन्हें कुदाली या खुरपी से हटाना पड़ता है। निराई, गुड़ाई और बीमारी पूर्व प्रबंधन के लिए भी लगातार खेतों में निगरानी करनी पड़ती है। किसी बीमारी का संकेत मिलने पर आदान बनाने और उसका स्प्रे करने में दोहरा श्रम लगता है। कुल मिलाकर देखें तो अलग-अलग आदान बनाने और खेती के सारे काम मशीनों की बजाए खुद हाथ से करने होते हैं।

जोगिंदर कहते हैं कि खेतों में काम करने के लिए मजदूरों की भारी कमी है और मजदूर ढूंढने पड़ते हैं। ज्यादातर प्रवासी मजदूर ही खेतों में काम करते हैं। हालांकि जोगिंदर यह भी स्वीकार करते हैं कि लंबे समय तक प्राकृतिक खेती करने से श्रम की आवश्यकता में कमी आती है क्योंकि जुताई की कम जरूरत पड़ती है और फसल पर बीमारियों का प्रकोप भी कम होता है।

जोगिंदर कहते हैं- जो किसान बड़े पैमाने पर खेती करते हैं, उनके लिए श्रम की अधिकता की वजह से इस खेती को अपनाना थोड़ा मुश्किल है, पर हमारे यहां किसानों के पास औसत भूमि कम है जिसमें अपेक्षाकृत आसानी से इसे अपनाया जा सकता है।

भारत, नेपाल और भूटान जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में एग्रो-इकोलॉजी मॉडल पर काम कर रही संस्था Alliance of Biodiversity and CIAT के प्रोजेक्ट लीड डॉ. जे. सी. राणा कहते हैं कि प्राकृतिक खेती में पूरे कृषि इकोसिस्टम को बदलने की क्षमता है। लेकिन इस पद्धति में श्रम की अधिक जरूरत पड़ती है। इसे लेबर-फ्रेंडली बनाए बिना इसे बड़े पैमाने पर टिकाऊ बनाना मुश्किल होगा। उनके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज—तीनों को मिलकर काम करना होगा।

बाजार और विपणन की चुनौतियाँ

खेती को केवल मुनाफे के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं। वर्ष 2023 में प्राकृतिक खेती और नौ-अनाज की पारंपरिक फसल प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए पद्म श्री से सम्मानित मंडी जिले के किसान नेकराम शर्मा कहते हैं, “यह दुख का विषय है कि हम खेती को सिर्फ इस आधार पर आंकते हैं कि उससे कितना पैसा मिल रहा है। नकद पैसे के चक्कर में हमने अपनी पारिस्थितिकी को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अगर हमें अपनी खेती और अपना स्वास्थ्य बचाना है, तो रास्ता प्राकृतिक खेती से होकर ही जाता है।”

नेकराम शर्मा कहते हैं- सरकार द्वारा दिया जा रहा प्रशिक्षण जरूरी है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। कृषि अधिकारियों और वैज्ञानिकों को गांव-गांव जाकर यह समझना होगा कि किसान को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और खेती को आसान बनाने के लिए उसे किन औजारों और तकनीकों की जरूरत है।

प्राकृतिक खेती से तैयार उत्पाद रासायनरहित और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक तो हैं लेकिन इनकी ब्रांडिंग, स्टोरेज और मार्केट लिंकेज को लेकर कई समस्याएं हैं। मई 2023 में नई दिल्ली स्थित सेंटर फार सांयस एंड एनवायरमेंट द्वारा प्रकाशित Market Access for Organic and Natural Produce Case studies में भी यह बात सामने आती है। रिपोर्ट की पेज संख्या 78 के अनुसार ज़्यादातर किसानों ने बाज़ार को लेकर बहुत नाराज़गी जताई क्योंकि उन्हें खेती की उपज का सही दाम नहीं मिल पा रहा। इसके बजाय, उनकी खेती की उपज को केमिकल वाले प्रोडक्ट के बराबर दाम पर बेचा जा रहा है। किसानों ने कहा कि लोकल व्यापारी उन्हें धोखा देते हैं और उनका शोषण करते हैं क्योंकि वे बाज़ार की तुलना में बहुत कम दाम देते हैं। खेती लागत में कमी ही एकमात्र बचत थी और इसका असर किसानों की इनकम में बढ़ोतरी के रूप में दिखा।

हिमाचल में अभी तक हुए शोध, किसानों के अनुभव और नीतिगत पहलों को साथ रखकर देखें तो साफ दिखता है कि प्राकृतिक खेती कृषि को जलवायु अनुकूल और अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में एक मजबूत शुरुआती कदम है। श्रम की अधिक आवश्यकता, बीजों की उपलब्धता और मार्केट लिंकेज तथा विपणन की समस्याओं को हल करने की जरूरत है ताकि इस खेती को सतत बनाया जा सके। हिमाचल को प्राकृतिक खेती को सिर्फ “रसायन-मुक्त खेती तकनीक” नहीं, बल्कि एक संपूर्ण कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखना होगा, जिसमें बीज, मिट्टी, श्रम, बाजार, नीति, शोध और समुदाय—सब आपस में जुड़कर आगे बढ़ें। अगर हिमाचल इन कड़ियों को मजबूत समन्वय के साथ जोड़ पाता है, तो यह न केवल अपने किसानों और पहाड़ों के लिए, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए जलवायु-अनुकूल खेती का एक जीवंत मॉडल बन सकता है।

रमन कान्त एशियन कालेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज हब के मेंटी हैं। यह कार्यक्रम जर्मनी की इंटरलिंक एकेडमी द्वारा समर्थित है।

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