शिमला, 10 मार्च।हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयास अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। राज्य में रसायन मुक्त और टिकाऊ खेती को प्रोत्साहित करने के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों और नीतियों का अध्ययन करने के लिए विदेशों से शोधकर्ता भी यहां पहुंच रहे हैं। इसी कड़ी में कृषि, खाद्य और पर्यावरण के लिए फ्रांसीसी राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान (INRAE–LISIS) के शोधार्थी हेमल ठक्कर इन दिनों हिमाचल प्रदेश के दौरे पर हैं। ठक्कर हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती मॉडल, उसकी नीति व्यवस्था और किसानों पर पड़ रहे उसके प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। हिमाचल में बड़े स्तर पर प्राकृतिक खेती को अपनाने की पहल ने देश-विदेश के शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है। Université Gustave Eiffel से जुड़े ठक्कर अपनी डॉक्टोरल शोध के तहत कृषि में एग्रोइकोलॉजिकल परिवर्तन और उसे बढ़ावा देने में सार्वजनिक नीतियों की भूमिका पर काम कर रहे हैं। उनका शोध यह समझने पर केंद्रित है कि किस प्रकार सरकारी नीतियां, संस्थागत ढांचे और ज्ञान प्रणालियां किसानों को टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती की ओर बढ़ने में सहायता करती हैं। अपने अंतरराष्ट्रीय तुलनात्मक अध्ययन के तहत वे फ्रांस, भारत और केन्या में एग्रोइकोलॉजी और प्राकृतिक खेती से जुड़ी पहलों का अध्ययन कर रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने 6 मार्च को शिमला में कृषि निदेशालय के अधिकारियों से मुलाकात कर राज्य में लागू प्राकतिक खेती की प्रगति और क्रियान्वयन के बारे में जानकारी हासिल की। कृषि निदेशालय में बैठक के दौरान अधिकारियों ने शोधार्थी हेमल ठक्कर से प्राकृतिक खेती से जुड़े नीति ढांचे, किसानों द्वारा इसके बढ़ते अपनाव और मिट्टी की सेहत, किसानों की आजीविका तथा पर्यावरणीय स्थिरता पर इसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। इस अवसर पर कृषि विभाग के निदेशक डॉ. रविंद्र सिंह जसरोटिया ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से न केवल खेती की लागत कम हो रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत में सुधार, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय में स्थिरता भी देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की रुचि राज्य में चल रही इस पहल की सफलता और महत्व को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के शैक्षणिक और शोध आदान-प्रदान से हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में हो रहे कार्यों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है। साथ ही ऐसे सहयोग से किसानों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच ज्ञान और अनुभवों का आदान-प्रदान भी संभव हो रहा है, जो टिकाऊ कृषि को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो सकता है। Post navigation बदलता मौसम, बदलती खेती: प्राकृतिक खेती कैसे बन रही है जलवायु संकट की ढाल