मशोबरा में राज्य स्तरीय महिला किसान दिवस आयोजित, 150 से अधिक महिला किसानों ने लिया भाग

शिमला। कृषि और बागवानी की अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान खेतों में काम करने तक सीमित नहीं है। बीजों के संरक्षण से लेकर फसल उत्पादन, पशुपालन, खाद्य विविधता, प्राकृतिक खेती और कृषि उत्पादों के विपणन तक महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। जरूरत इस योगदान को पहचान देने के साथ महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण, बाजार और आर्थिक निर्णयों में अधिक भागीदारी के अवसर उपलब्ध करवाने की है। यह बात परियोजना निदेशक (आतमा) शिमला डॉ. देवी चंद कश्यप ने महिला किसान दिवस के अवसर पर कही।

शिमला जिले के मशोबरा में 15 अक्टूबर को आयोजित राज्य स्तरीय महिला किसान दिवस कार्यक्रम में 150 से अधिक महिला किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका, उनके अनुभवों, प्राकृतिक खेती के प्रसार और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने पर चर्चा की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कृषि प्रशिक्षण एवं विस्तार संस्थान के निदेशक डॉ. संतोष गुप्ता ने की। उन्होंने कहा कि कृषि विकास और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में महिला किसानों का योगदान महत्वपूर्ण है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर टिकाऊ कृषि पद्धतियों को व्यापक स्तर पर अपनाने में मदद मिल सकती है।

कार्यक्रम के दौरान डॉ कश्यप ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में खेती की चुनौतियां मैदानी क्षेत्रों से अलग हैं। यहां छोटी जोतें, ढलानदार खेत, सीमित सिंचाई, बढ़ती उत्पादन लागत और मौसम में बदलाव किसानों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। इन परिस्थितियों में परिवार की कृषि व्यवस्था को बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका विशेष महत्व रखती है। वे खेतों में बुवाई, निराई-गुड़ाई, कटाई, पशुपालन, बीज संरक्षण और घरेलू खाद्य जरूरतों के प्रबंधन में योगदान देती हैं। इसके बावजूद कृषि से जुड़े कई आर्थिक निर्णयों, तकनीकी सेवाओं और बाजार तक पहुंच में उनकी भागीदारी को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि महिला किसानों का योगदान केवल परिवार की आजीविका तक सीमित नहीं है। वे यह भी तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं कि खेतों में कौन-सी फसल उगाई जाए, घर के लिए कितना अनाज सुरक्षित रखा जाए और परिवार की पोषण संबंधी जरूरतें कैसे पूरी हों। पारंपरिक अनाजों, दालों, स्थानीय सब्जियों और मौसमी खाद्य पदार्थों के संरक्षण में महिलाओं का अनुभव कृषि जैव विविधता और पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

आज जब कृषि को टिकाऊ बनाने, मिट्टी की सेहत सुधारने और रसायनों पर निर्भरता कम करने की चर्चा हो रही है, तब महिलाओं का यह पारंपरिक ज्ञान आधुनिक कृषि विज्ञान के साथ मिलकर उपयोगी भूमिका निभा सकता है। हालांकि, इसके लिए महिला किसानों को केवल योजनाओं का लाभार्थी मानने के बजाय कृषि विकास की सक्रिय भागीदार बनाना जरूरी है।

डॉ. कश्यप ने कृषि विभाग की योजनाओं के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राजीव गांधी प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत प्रयास किए जा रहे हैं। इस पद्धति में स्थानीय संसाधनों, गोबर, गोमूत्र और वनस्पति आधारित आदानों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है। इसका उद्देश्य खेती में बाहरी आदानों पर निर्भरता कम करना, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और उत्पादन प्रणाली को अधिक टिकाऊ बनाना है।

प्राकृतिक खेती में बहुफसली प्रणाली का भी महत्व है। एक ही खेत में अलग-अलग अवधि में तैयार होने वाली कई फसलें उगाने से किसान की आय के स्रोत विविध हो सकते हैं। साथ ही, अनाज, दालों, सब्जियों और अन्य फसलों का उत्पादन घरेलू खाद्य विविधता को बढ़ाने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसके लाभ फसल, क्षेत्र, मौसम, बाजार और अपनाई गई तकनीकों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

प्रदेश में प्राकृतिक खेती को अपनाने वाले किसानों में महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी रही है। महिलाओं को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण देना तभी अधिक प्रभावी होगा, जब उन्हें स्थानीय स्तर पर तकनीकी मार्गदर्शन, गुणवत्ता संबंधी जानकारी, उपयुक्त बाजार और उत्पादों के विपणन में सहयोग भी मिले। प्रशिक्षण के साथ खेतों पर प्रदर्शन, महिला किसान समूहों का गठन और सफल मॉडलों का आदान-प्रदान इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं।

कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र शर्मा और डॉ. संगीता ने महिला किसानों को प्राकृतिक खेती की विभिन्न तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। इसका उद्देश्य महिलाओं को रसायनों पर निर्भरता कम करने वाली कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना और उन्हें अपने खेतों में इन तकनीकों को अपनाने के साथ दूसरे किसानों तक भी पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित करना था। राज्य स्तरीय कार्यक्रम के अलावा शिमला जिले के सभी विकास खंडों में भी महिला किसान दिवस मनाया गया। इस अवसर पर क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, मशोबरा के सहनिदेशक डॉ. दिनेश ठाकुर, परियोजना उपनिदेशक डॉ. अनिल ठाकुर (आतमा) और आतमा परियोजना के अन्य अधिकारी उपस्थित रहे

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *