वनाग्नि की बड़ी वजह मानी जाने वाली चीड़ की पत्तियों को अब बायोचार में बदलने की पहल। दावा है कि इससे कार्बन का दीर्घकालिक भंडारण, मिट्टी की उर्वरता में सुधार और स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के नए अवसर पैदा होंगे। हिमाचल प्रदेश में गर्मियां आते ही चीड़ के जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ने लगती हैं। इसकी एक प्रमुख वजह जंगलों की जमीन पर बड़ी मात्रा में जमा होने वाली सूखी चीड़ की पत्तियां हैं, जो अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं और मामूली चिंगारी से भी भीषण आग का रूप ले सकती हैं। वर्षों से वन विभाग इस समस्या से जूझ रहा है और इन पत्तियों के प्रबंधन का कोई स्थायी समाधान तलाश रहा था। अब इन्हीं पत्तियों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक संभावित समाधान के रूप में देखा जा रहा है। बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के हमीरपुर में नेरी स्थित परिसर में 1.5 टन प्रतिदिन क्षमता वाले स्वदेशी बायोचार संयंत्र का संचालन शुरू हो गया है। परियोजना से जुड़े संस्थानों का दावा है कि यह भारत का पहला स्वदेशी रूप से विकसित बायोचार संयंत्र है, जिसे विशेष रूप से वनों से निकलने वाले जैविक अवशेषों के प्रबंधन के लिए विकसित किया गया है। यह संयंत्र प्रतिदिन लगभग 450 किलोग्राम बायोचार का उत्पादन करेगा। इसे केवल उत्पादन इकाई के रूप में नहीं बल्कि अनुसंधान, प्रदर्शन और प्रशिक्षण केंद्र के रूप में भी विकसित किया गया है, ताकि भविष्य में इस मॉडल को अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सके। हिमाचल प्रदेश के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में फैले चीड़ के जंगल हर वर्ष बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियां गिराते हैं। इनमें मौजूद राल (रेजिन) इन्हें अत्यधिक ज्वलनशील बनाती है। यही कारण है कि जंगलों में लगने वाली अधिकांश आग तेजी से फैलती है और हर साल हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र इसकी चपेट में आ जाता है। अब तक इन पत्तियों का अधिकांश हिस्सा या तो जंगलों में सड़ता था या आग की भेंट चढ़ जाता था, जिससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता था। नई परियोजना का उद्देश्य इसी वन अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलना है। संयंत्र में सबसे पहले चीड़ की पत्तियों और अन्य वन अवशेषों को एकत्र कर सुखाया जाता है। इसके बाद इन्हें पाइरोलिसिस (Pyrolysis) प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इस प्रक्रिया में बायोमास को कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में यही जैविक पदार्थ सड़ने या जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में वातावरण में मिल जाता है, लेकिन पाइरोलिसिस के दौरान इसका अधिकांश कार्बन एक स्थिर ठोस पदार्थ—बायोचार—में परिवर्तित हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कार्बन सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी में सुरक्षित रह सकता है। बायोचार मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाने, पोषक तत्वों को लंबे समय तक बनाए रखने और मिट्टी की उर्वरता सुधारने में भी सहायक माना जाता है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में इसे जलवायु परिवर्तन से निपटने की संभावनाशील तकनीकों में शामिल किया जा रहा है। इस स्वदेशी तकनीक की एक और विशेषता यह है कि इससे केवल बायोचार ही नहीं बल्कि बायो-ऑयल और वुड विनेगर जैसे उत्पाद भी तैयार किए जा सकते हैं। इससे परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता बढ़ने की संभावना है। वैज्ञानिकों का कहना है कि संयंत्र को इस तरह डिजाइन किया गया है कि भविष्य में इसमें केवल चीड़ की पत्तियों ही नहीं बल्कि कृषि अवशेष, वन अपशिष्ट और आक्रामक विदेशी पौधों (इनवेसिव प्रजातियों) सहित विभिन्न प्रकार के बायोमास का भी उपयोग किया जा सके। इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी है। परियोजना के तहत आसपास के गांवों के लोगों से चीड़ की सूखी पत्तियां और अन्य वन अवशेष एकत्रित कराए जाएंगे, जिसके बदले उन्हें भुगतान किया जाएगा। इससे अब तक बेकार समझी जाने वाली चीड़ की पत्तियां ग्रामीणों के लिए आय का स्रोत बन सकती हैं। स्थानीय लोगों, विशेषकर महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए यह अतिरिक्त रोजगार का अवसर भी पैदा करेगा। साथ ही जंगलों में ज्वलनशील बायोमास की मात्रा कम होने से वनाग्नि का खतरा भी घटेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब वन संरक्षण से स्थानीय समुदायों की आय जुड़ेगी तो जंगलों के संरक्षण में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी। परियोजना हिमाचल प्रदेश वन विभाग, आईआईटी रुड़की, डॉ. वाई.एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय और प्रोक्लाइम के सहयोग से विकसित की गई है। वन विभाग चीड़ की पत्तियों सहित अन्य वन अवशेषों की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा, जबकि विश्वविद्यालय बायोचार के कृषि और मिट्टी पर प्रभाव से जुड़े अनुसंधान का नेतृत्व करेगा। संयंत्र की तकनीकी डिजाइन आईआईटी रुड़की ने विकसित की है। हिमाचल प्रदेश सरकार के पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव डॉ. सुशील कुमार सिंगला ने संयंत्र के उद्घाटन के दौरान कहा कि यह परियोजना वनाग्नि की समस्या को जलवायु समाधान में बदलने का प्रयास है। उनके अनुसार इससे कार्बन का दीर्घकालिक भंडारण होगा, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार आएगा और राज्य के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस पहल में सरकार, स्थानीय समुदायों, अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र की साझेदारी को एक साथ जोड़ा गया है, ताकि इसे दीर्घकालिक और टिकाऊ मॉडल के रूप में विकसित किया जा सके। हाल के वर्षों में दुनिया भर में बायोचार को कार्बन हटाने (कार्बन रिमूवल) की एक संभावनाशील तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सफलता केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करेगी। यह इस बात पर भी निर्भर करेगी कि किसानों द्वारा बायोचार को कितनी स्वीकार्यता मिलती है, बायोमास की नियमित आपूर्ति कितनी सुनिश्चित हो पाती है और इसकी आर्थिक व्यवहार्यता कितनी मजबूत साबित होती है। फिर भी हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य, जहां हर वर्ष वनाग्नि से हजारों हेक्टेयर जंगल प्रभावित होते हैं, वहां यह पहल एक साथ कई चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती दिखाई देती है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो यह वनों में जमा ज्वलनशील बायोमास के प्रबंधन, कार्बन उत्सर्जन में कमी, मिट्टी की सेहत सुधारने और स्थानीय समुदायों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर सृजित करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। हमीरपुर का यह संयंत्र फिलहाल एक पायलट मॉडल है, लेकिन इसकी सफलता भारत के अन्य वन क्षेत्रों—विशेषकर उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों—के लिए भी बायोमास प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन का एक नया रास्ता खोल सकती है। Post navigation A Small move to Sustainable Movement