फरवरी का अंत और मार्च का लगभग पूरा महीना भारतीय मीडिया के लिए असल में भारी और उलझन भरा दौर रहा। अमेरिका और इजराइल ने एक साथ ईरान पर हमला कर दिया इसके बाद पश्चिम एशिया में भू-राजनैतिक अस्थिरता के चलते भारत भी मुश्किल में फंस गया। हमेशा संतुलन साधने वाली विदेश नीति रखने वाले भारत को एकदम नई जटिल परिस्थितियों से जूझना पड़ा। इस युद्ध के दौरान भारतीय मीडिया की प्राथमिकताएं, उसकी सीमाएं और असलियत परत दर परत खुलकर सामने आ गईं। खबरों के नाम पर अफवाहबाजी, अटकलें और सरकारी प्रचार की भरमार के बीच एआई का भद्दा एवं फूहड़ इस्तेमाल टीवी पर देखने को मिला। कई बार तो यही लगा कि मीडिया इतने नाजुक वक्त में जिम्मेदारी से काम कर भी रहा है या नहीं। 28 फरवरी को ईरान पर हुए हमले में उसके सबसे बड़े नेता अयातुल्ला अली खामनेई के साथ कई बड़े सैन्य अधिकारी मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल दाग दी। हालात मिनटों में बदलने लगे। इस बीच भारत को अपना कूटनीतिक संतुलन संभालना भारी पड़ा। एक तरफ ईरान के साथ भारत की चाबहार बंदरगाह जैसी बड़ी परियोजनाएं और ऊर्ज़ा के रिश्ते थे। दूसरी ओर इजराइल के साथ बढ़ता सैन्य-तकनीकी सहयोग। प्रधानमंत्री मोदी खुद के इजराइल दौरे की खबर ने स्थिति और नाजुक कर दी थी। जहां तक भारत की प्रतिक्रिया की बात है, सरकार की ओर से किए संवाद में एक-एक शब्द संभलकर बोला गया। सतर्कता दिखाते हुए सरकार ने न तो ईरान पर सीधा बयान दिया, न खामनेई की मौत पर अफसोस जताया। सरकार के इस रवैये का असर सीधा मीडिया कवरेज में दिखा। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने सरकारी सोच को ही पास कर दिया। विपक्ष ने चाहे जैसे नैतिक या कूटनीतिक सवाल उठाए, उन्हें मीडिया ने ज्यादा हवा ही नहीं दी। इसमें पत्रकारिता की आज़ादी और सवाल उठ गए। इसके साथ, सोशल मीडिया में सेंसरशिप का मामला तेज़ी से उठा। सरकार की आलोचना करने वाली पोस्ट, मीम, कार्टून या बाकी आज़ाद टिप्पणियां खूब हटाई गईं। ये सेंसरशिप ऐसे कानूनों के तहत लागू की गई, जिनमें न पारदर्शिता है न कोई रिकॉर्ड सबके सामने लाया गया। लोगों को सचमुच डर लगने लगा कि कुछ खुलकर लिखा या कहा, तो पोस्ट डिलीट, अकाउंट ब्लॉक। टीवी चैनलों की बात करें तो, यहां तो हालात और बिगड़े दिखे। कई न्यूज़ चैनल तो सूचना देने की बजाय युद्ध को तमाशा बनाने में जुटे नजर आए। ग्राफिक्स, फर्जी धमाके, बढ़ा-चढ़ा कर हेडलाइन पेश करने के चक्कर में हकीकत पीछे छूट गई। टीआरपी की होड़ में मीडिया इतनी आगे बढ़ गई कि सूचना मंत्रालय को भी बीच में कूदना पड़ा और चैनलों के टीआरपी डेटा पर रोक लगा दी गई। इसका मतलब साफ था—दर्शक बटोरने के चक्कर में न्यूज चैनलों ने अपने असली काम को भुला दिया। इसी दौरान गलत सूचना और तथ्यात्मक गड़बड़ी भी जमकर फैली। पुराने वीडियो नए घटनाक्रम में जोड़कर चला दिए गए, ऐतिहासिक डेटा में गड़बड़ दिखी। सबसे नया खतरा था एआई से बने नकली वीडियो—इनमें नेताओं के नकली बयान वायरल होने लगे। मीडिया की फैक्ट-चेकिंग भी इस तेज़ी से फैलती ग़लत खबरों के सामने कमजोर ही साबित हुई। सबसे बुरा ये था कि युद्ध के मानवीय पहलू को मीडिया ने लगभग अनदेखा कर दिया। ईरान के मिनाब शहर में जब स्कूल पर हमला हुआ, बहुत से बच्चे मारे गए—मगर ऐसी ख़बरें चैनलों की प्राथमिकता ही नहीं बनी। इसके बजाय सैन्य गतिविधियां और तकनीकी बातें लाइमलाइट में रहीं, आम आदमी की तकलीफें पीछे छूट गईं। यहीं मीडिया की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा हुआ। इस कवरेज का असर बाहर रह रहे भारतीयों और ईरान में पढ़ने वाले छात्रों के परिवारों पर दिखा। सनसनीखेज और बिना पुष्टि वाली ख़बरों ने लोगों के मन में डर और उलझन बढ़ा दी। जब टीवी ही उनका मुख्य स्रोत था, तो गलत या अतिरंजित रिपोर्टिंग ने तनाव कई गुना बढ़ाया। युद्ध के दौरान डिजिटल प्रोपेगंडा और कट्टर विचारधारा फैलाने की भी नई कोशिशें दिखीं। कई भाषा में एआई से बने वीडियो, मेसेज की ज़द में युवा तेजी से आ रहे थे। साफ है, अब जंग सिर्फ बॉर्डर या मिसाइल से नहीं लड़ी जा रही—जानकारी और दिमागी स्तर पर प्रमुखता से लड़ी जा रही है। इसी पूरे मामले ने भारतीय मीडिया का एक और कमजोर पक्ष उजागर किया—पश्चिमी मीडिया पर जरूरत से ज़्यादा भरोसा। ज्यादातर रिपोर्टिंग विदेशी एजेंसियों के हवाले से आई, जिससे भारतीय नजरिया गुम हो गया और पश्चिमी सोच भी शामिल हो गई। स्थानीय और क्षेत्रीय स्रोतों से कम ही काम लिया गया—जबकि वही असलियत थोड़ा बेहतर दिखा सकते थे। कुल मिलाकर, ये पूरा घटनाक्रम भारतीय मीडिया के लिए एक सबक है पर मुझे खास उम्मीद नहीं है कि हमारा मीडिया इसे याद रखेगा। राजनीति, कारोबारी दबाव और टेक्नोलॉजी की लहर में मीडिया ने संतुलन कहीं दूर खो ही दिया है। आगे बढ़ने के लिए जरूरत इस बात की है कि युद्ध और संकट की रिपोर्टिंग में साफ-सुथरे तथ्य, कई पहलुओं से देखने की कोशिश और इंसानों की संवेदनाओं को अहमियत दी जाए—ताकि फिर से जनता का भरोसा भी वापस आ सके। Post navigation हिमाचल प्रदेश बजट 2026-27ः पर्यावरणीय महत्वाकांक्षा और आर्थिक संकट के बीच संतुलन की तलाश