राज्य सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर आय, रोजगार और टिकाऊ विकास का नया ढांचा तैयार करने की कोशिश की है

लेखक- रमन कान्त

हिमाचल प्रदेश का 2026-27 का बजट राज्य की अर्थव्यवस्था को समझने का एक अलग नजरिया प्रस्तुत करता है। जहां अधिकांश राज्य औद्योगिक निवेश और शहरी बुनियादी ढांचे को विकास का आधार बना रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर विकास की रणनीति तैयार की है। यह दृष्टिकोण न केवल हिमाचल की भौगोलिक वास्तविकताओं के अनुरूप है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास के वैश्विक विमर्श के साथ भी मेल खाता है। बजट भाषण में भी यह स्पष्ट रूप से में कहा गया है कि प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ ग्रामीण क्षेत्र हैं और नीतियों का फोकस इन्हीं क्षेत्रों को मजबूत करने पर रखा गया है।

सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केवल कृषि तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक ढांचे के रूप में देखने की कोशिश की है, जिसमें खेती, पशुपालन, डेयरी, बागवानी, पारंपरिक आजीविका और स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह दृष्टिकोण हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां भूमि सीमित है और आय के एकमात्र स्रोत पर निर्भरता जोखिमपूर्ण हो सकती है। ऐसे में विविध आय स्रोतों का निर्माण ही आर्थिक स्थिरता की कुंजी बनता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बढ़ाने के लिए डेयरी क्षेत्र पर दिया गया जोर इस बजट की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। पिछले कुछ वर्षों में दूध के खरीद मूल्य में जो वृद्धि हुई है, वह इस दिशा में सरकार की प्राथमिकता को स्पष्ट करती है। जहां पहले गाय के दूध का मूल्य 51 रुपये प्रति लीटर से 10 रूपये की बढ़ोतरी करते हुए बढ़ाकर अब 61 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है, जबकि भैंस के दूध का मूल्य 61 से  71 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है। यह वृद्धि केवल कीमतों का संशोधन नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों को नियमित नकद आय उपलब्ध कराने की रणनीति का हिस्सा है। हिमाचल जैसे राज्य में, जहां छोटे और सीमांत किसान बड़ी संख्या में हैं, वहां इस तरह की आय उनके जीवन स्तर में सीधा बदलाव ला सकती है। इसी तरह पशुपालन क्षेत्र के लिए कुल 734 करोड़ रूपये के बजट का प्रावधान किया गया है।

डेयरी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सरकार ने केवल मूल्य बढ़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा है। कांगड़ा में लगभग 200 करोड़ रुपये की लागत से एक बड़े दूध प्रोसेसिंग प्लांट का निर्माण किया जा रहा है, जबकि करीब 100 करोड़ रुपये के निवेश से नए चिलिंग और प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित किए जाएंगे। यह निवेश संकेत देता है कि सरकार उत्पादन, संग्रहण और विपणन की पूरी श्रृंखला को व्यवस्थित करना चाहती है। इसके साथ ही प्रति लीटर प्रोत्साहन राशि को 3 रुपये से बढ़ाकर 6 रुपये करना यह दर्शाता है कि नीति का फोकस सीधे किसानों के हाथ में पैसा पहुंचाने पर है।

किसानों की कृषि लागत में कमी और पोषणयुक्त खाद्यान को बढावा देने के लिए हिमाचल सरकार ने प्राकृतिक खेती पर विशेष जोर दिया है। हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक खेती उत्पादों पर एमएसपी देने वाले देश का पहला राज्य है और इस बार 5 फसलों में एमएसपी दिया जाएगा। राज्य में पहले से ही लगभग 2 लाख 23 हजार किसान 38 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। सरकार ने इस आधार को मजबूत करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि की है। प्राकृतिक गेहूं का एमएसपी 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम, मक्का का 40 से 50 रुपये, जौ का 60 से 80 रुपये और हल्दी का 90 से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है, जबकि अदरक के लिए पहली बार 30 रुपये प्रति किलोग्राम का समर्थन मूल्य तय किया गया है। सरकार प्राकृतिक खेती को केवल प्रोत्साहन के स्तर पर नहीं रखना चाहती, बल्कि उसे आर्थिक रूप से सुरक्षित और लाभकारी बनाना चाहती है। यह मॉडल विशेष रूप से उस समय महत्वपूर्ण हो जाता है जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और रासायनिक खेती के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं।

इस बार बजट में क्षेत्रिय बीजों पर भी बल देने की बात कही गई है और सरकार ने बीज सम्प्रभुता सुनिश्चित करने हेतु ”बीज गाँव“ स्थापित करने का निर्णय लिया है इसमें 50-100 किसान समूहों में पारंपरिक  बीज उत्पादन करेंगे। इसके लिए उत्पादकों को प्रति बीघा 5,000 रुपये सब्सिडी और प्रत्येक गाँव को 2 लाख रुपये का एकमुश्त इन्फ्रास्ट्रक्चर अनुदान दिया जाएगा। इसके अलावा सरकार प्रदेश में हिमाचल प्रदेश राज्य किसान आयोग अधिनियम के माध्यम से ”हिमाचल प्रदेश राज्य किसान आयोग“ का गठन भी करेगी।

पारंपरिक आजीविका और समुदायों को इस बजट में जिस तरह शामिल किया गया है, वह इसकी एक और महत्वपूर्ण विशेषता है। गद्दी, गुज्जर और अन्य चरवाहा समुदायों के लिए 300 करोड़ रुपये की पहल योजना का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत उन्हें डिजिटल पहचान, बीमा और पशुधन प्रबंधन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। यह प्रयास केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि उन समुदायों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। ऊन के लिए 100 रुपये प्रति किलोग्राम का समर्थन मूल्य तय करना इस क्षेत्र को बाजार की अस्थिरता से बचाने का प्रयास है।

ग्रामीण युवाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए भी बजट में कई पहलें की गई हैं। मुर्गीपालन और अन्य स्वरोजगार गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सरकार यह संकेत दे रही है कि रोजगार के अवसर स्थानीय स्तर पर ही विकसित किए जाने चाहिए। यह दृष्टिकोण न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी, क्योंकि इससे ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन को कम किया जा सकता है।

इस बजट की एक महत्वपूर्ण परत यह है कि जहां एक ओर परंपरा और स्थानीय आजीविका को मजबूत करने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर इन क्षेत्रों में तकनीक के उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। डेयरी क्षेत्र में इंटीग्रेटेड मोबाइल ऐप के माध्यम से दूध संग्रहण, भुगतान और पशु स्वास्थ्य सेवाओं को डिजिटल बनाने की योजना है। उन्नत मिल्क एनालाइज़र और अन्य तकनीकी उपकरणों के माध्यम से गुणवत्ता नियंत्रण को बेहतर किया जाएगा। इसी तरह चरवाहा समुदायों के पारंपरिक मार्गों की मैपिंग और उनके डेटा का डिजिटलीकरण भी प्रस्तावित है। यह प्रयास दर्शाता है कि सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर उसे अधिक प्रभावी और प्रतिस्पर्धी बनाना चाहती है।

बागवानी और फसल विविधीकरण के क्षेत्र में भी इस बजट में विशेष ध्यान दिया गया है। क्लस्टर आधारित विकास और उच्च मूल्य वाली फसलों को बढ़ावा देकर किसानों को बेहतर आय के अवसर प्रदान करने की कोशिश की जा रही है। यह हिमाचल की पारंपरिक ताकत को आधुनिक बाजार से जोड़ने की दिशा में एक स्वाभाविक कदम है, जिससे किसानों की आय में स्थायी वृद्धि संभव हो सकती है।

हालांकि, इन सभी पहलों के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियां, बाजार तक पहुंच की सीमाएं, परिवहन लागत और सीमित वित्तीय संसाधन ऐसे कारक हैं जो योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकते हैं। प्राकृतिक खेती के विस्तार के लिए बाजार और मजबूत प्रमाणन प्रणाली की आवश्यकता होगी, जबकि डेयरी क्षेत्र में उत्पादन और मांग के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा।

इसके बावजूद यह बजट एक स्पष्ट संकेत देता है कि राज्य सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्व को समझते हुए उसे विकास के केंद्र में रखा है। यह केवल योजनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच का प्रतिबिंब है जिसमें गांवों को विकास के लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास के चालक के रूप में देखा गया है। सरकार ने परंपरा, संसाधन और तकनीक के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में जो प्रयास शुरू किए हैं, वे यदि समयबद्ध और प्रभावी तरीके से लागू होते हैं, तो हिमाचल के लिए एक ऐसे विकास मॉडल की नींव रख सकते हैं जो आर्थिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से समावेशी और पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ हो।

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