पिछले शनिवार को हिमाचल प्रदेश विधानसभा में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बजट पेश किया गया। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपना चौथा बजट पेश किया और भाजपा द्वारा सरकार गिराने की नाकाम कोशिश, अपनी सरकार पर देवी-देवताओं के साथ जनता के आशीर्वाद का उल्लेख किया। केंद्र द्वारा राजस्व घाटा ग्रांट (RDG) बंद होने के बाद पेश किए गए बजट का आकार 58,514 करोड़ से घटकर 54,928 करोड़ रह गया जो वित्तीय संकट से गुजर रहे प्रदेश की स्थिति को बयां करता है। पर्यावरणीय बदलावों से गुजर रहे हिमाचल में सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास की महत्वाकांक्षी तस्वीर पेश करने की कोशिश की है लेकिन आर्थिक सीमाओं का जो यथार्थ खड़ा है, वह इस तस्वीर को पूरा होने से पहले ही धुंधला कर रहा है। बजट में सरकार ने वन क्षेत्र को मौजूदा 29.52 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया है जिसके लिए राजीव गांधी वनसम्वर्धन योजना के तहत 4,000 हेक्टेयर में वनीकरण का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना के लिए 55 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है। योजना के तहत महिला मंडलों और युवक मंडलों को सक्रिय भागीदारी देने की बात कही गई है। करीब 15,000 महिलाओं के इस अभियान में शामिल होने की उम्मीद है। प्रत्येक समूह को 1.20 लाख रुपये दिए जाएंगे, और 50 प्रतिशत से अधिक पौधों के जीवित रहने की दर हासिल करने वाले समूहों को एक लाख रुपये का अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार चाहती है कि 80 प्रतिशत वृक्षारोपण गतिविधियाँ महिलाओं द्वारा हों। लेकिन यहाँ एक विरोधाभास दिखता है। सरकार ने वनीकरण के लिए 320 करोड़ रुपये और वन पारिस्थितिकी प्रबंधन के लिए 50 करोड़ रुपये का अलग से प्रावधान किया है । यह राशि अपने आप में बड़ी है, लेकिन जब राज्य पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है और हर माह वेतन-पेंशन के लिए 2,800 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ती है , तो यह सवाल उठता है कि क्या ये पर्यावरणीय लक्ष्य वित्तीय संकट के बीच प्राथमिकता बने रह पाएंगे? 50,000 करोड़ के ग्रीन बोनस की अधूरी मांग सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है जो बजट भाषण से पहले घटी। मुख्यमंत्री सुक्खू ने मार्च की शुरुआत में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर उन्हें प्रदेश की आर्थिकी स्थिति से अवगत कराया था। 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद किए जाने से राज्य के राजस्व होने वाले नुकसान के समाधान के लिए उन्होंने एक अनूठा प्रस्ताव रखा — 50,000 करोड़ रुपये का वार्षिक “ग्रीन बोनस”। मुख्यमंत्री का तर्क था कि हिमाचल 67 प्रतिशत वन क्षेत्र को संरक्षित रखता है, जो पारिस्थितिकीय सेवाओं के रूप में पूरे देश को लाभ पहुँचाता है। उन्होंने कहा कि सभी राज्यों को एक समान मापदंड पर आंकना “न तो स्वस्थ है और न ही पारदर्शी”। लेकिन केंद्रीय बजट 2026-27 में इस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। मुख्यमंत्री ने बजट को “निराशाजनक” और “गरीब-विरोधी, किसान-विरोधी” बताया। उन्होंने कहा कि राजस्व घाटा अनुदान खत्म होने से हिमाचल जैसे छोटे और पहाड़ी राज्यों को “विनाशकारी” झटका लगा है। यहाँ एक गंभीर सवाल उठता है: यदि हिमाचल पर्यावरण संरक्षण की कीमत पर अपनी आर्थिक विकास की संभावनाओं को सीमित कर रहा है, तो क्या केंद्र सरकार को इसकी भरपाई नहीं करनी चाहिए? मुख्यमंत्री सुक्खू ने इसे “सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ” बताया । यह तर्क अपनी जगह ठीक है, लेकिन जब केंद्र से मदद नहीं मिलती, तो राज्य सरकार के सामने यह विकल्प आता है कि वह या तो पर्यावरणीय लक्ष्यों में ढील दे, या विकास खर्च में कटौती करे। संकट के बीच एक उम्मीद की किरण बजट में सबसे सकारात्मक पहलू ऊर्जा क्षेत्र में दिखता है। सरकार ने 2026 तक हिमाचल को देश का पहला “हरित ऊर्जा राज्य” बनाने का लक्ष्य रखा है। सौर ऊर्जा पर विशेष फोकस है — 500 मेगावाट की सौर क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य है, जिसमें कांगड़ा के दमताल में 200 मेगावाट का बड़ा सौर संयंत्र शामिल है । “ग्रीन पंचायत योजना” के तहत 100 पंचायतों में 500-500 किलोवाट की सौर परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए ब्याज सब्सिडी की व्यवस्था भी की गई है । यह पहल दो दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। एक, यह राज्य को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएगी। दो, यह पर्यावरण संरक्षण की उसी राह पर एक कदम है जिस पर राज्य चल रहा है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या ये परियोजनाएँ राज्य के आर्थिक संकट को कम करने में सक्षम होंगी? स्थिरता और विकास के बीच संतुलन बजट में पर्यटन क्षेत्र के लिए 3,045 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, और लक्ष्य है कि पर्यटन राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में 9 प्रतिशत तक का योगदान दे। शिमला और मनाली को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है, जहाँ पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन पर ध्यान दिया जाएगा, जिसमें सौर ऊर्जा प्रोटोकॉल और कार्बन-न्यूट्रल पर्यटन प्रथाओं को शामिल किया गया है। इको-टूरिज्म को संरक्षण प्रयासों से जोड़ते हुए 50 इको-टूरिज्म इकाइयां विकसित की जाएंगी। कुल्लू जिले में पहले ही 16 इको-टूरिज्म स्थलों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें से पांच को नीलामी के माध्यम से आवंटित किया गया है। इन स्थलों से वन विभाग को सालाना करीब 1.5 करोड़ रुपये का राजस्व हो रहा है। यह मॉडल सराहनीय है क्योंकि यह स्थानीय समुदायों को रोजगार से जोड़ता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है। बजट में महिलाओं को होमस्टे, गाइडिंग सेवाओं और हस्तशिल्प के लिए 3 लाख रुपये तक का ऋण और 10 लाख रुपये तक की मैचिंग ग्रांट देने का प्रावधान है। लेकिन यहाँ भी एक विरोधाभास है। एक ओर सरकार सतत पर्यटन की बात कर रही है, तो दूसरी ओर गग्गल हवाई अड्डे को “एयर सिटी” के रूप में विकसित करने के लिए 3,349 करोड़ रुपये भूमि अधिग्रहण के लिए और 2,000 करोड़ रुपये विकास के लिए आवंटित किए गए हैं। इस तरह के बड़े पैमाने के बुनियादी ढांचे के विकास का पर्यावरणीय प्रभाव क्या होगा? क्या यह उन संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा से टकराव पैदा नहीं करेगा जहाँ सोलर प्रोटोकॉल और कार्बन-न्यूट्रल प्रथाओं की बात की जा रही है? बजट की अनकही कहानी बजट आंकड़ों के बीच छिपी है। राज्य पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। राजस्व घाटा अनुदान बंद होने से राज्य के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा समाप्त हो गया है। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कठोर मितव्ययिता के उपाय किए हैं — मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन में 6 महीने के लिए कटौती की घोषणा की गई है। मुख्यमंत्री ने स्वयं अपने वेतन का 50 प्रतिशत स्थगित करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री ने इसे “हिम्मत” की मिसाल बताया। उन्होंने कहा, “हम चुनाव के लिए नहीं, राज्य और लोगों के लिए काम कर रहे हैं। मैं सभी वर्गों से छह महीने का सहयोग मांगता हूँ, और मैं आश्वासन देता हूँ कि हिमाचल प्रदेश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा”। लेकिन यह “हिम्मत” कितनी टिकाऊ है? जब राज्य के कर्मचारियों और पेंशनरों को केंद्र सरकार के समकक्षों की तुलना में 15 प्रतिशत पिछड़े महंगाई भत्ते और वेतन संशोधन का भुगतान नहीं किया जा सका है , तो यह सवाल उठता है कि पर्यावरणीय लक्ष्यों के लिए किए जा रहे बड़े दावे कितने यथार्थवादी हैं। महत्वाकांक्षा और यथार्थ के बीच हिमाचल प्रदेश का बजट 2026-27 पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। वन क्षेत्र को 32 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य, महिला मंडलों की सक्रिय भागीदारी से वनीकरण, सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार, और सतत पर्यटन पर जोर — ये सभी पहल मिलकर एक व्यापक पर्यावरणीय रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन इस बजट की असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी, जब राज्य को आर्थिक संकट और पर्यावरणीय लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना होगा। 50,000 करोड़ रुपये के “ग्रीन बोनस” की मांग अधूरी रह गई है, राजस्व घाटा अनुदान बंद हो गया है, और राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा था कि “हिमाचल के लोग पहाड़ों की तरह मजबूत हैं” यह सच है। लेकिन पहाड़ों की तरह मजबूत होने के लिए ठोस आधार की जरूरत होती है। वह आधार आर्थिक स्थिरता है। यदि यह स्थिरता नहीं मिलती, तो पर्यावरणीय महत्वाकांक्षाएँ भी धीरे-धीरे ढह सकती हैं। Post navigation हिमाचल का बजट: गांवों पर दांव, प्राकृतिक खेती और डेयरी से विकास की नई राह सेंसरशिप, AI और TRP: युद्ध कवरेज में भारतीय मीडिया की परतें