लेखकः अजय पराशर हिमाचल प्रदेश में एक बार फिर पंचायत चुनाव लोकतंत्र के उत्सव के रूप में दस्तक दे रहे हैं। यह चुनाव केवल स्थानीय प्रतिनिधियों को चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह गांवों के भविष्य की दिशा तय करता है। भारत को गांवों का देश कहा जाता है और हिमाचल प्रदेश की लगभग 90 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ऐसे में पंचायत चुनावों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इन्हीं चुनावों के जरिए यह तय होता है कि गांवों में सड़कें कैसी होंगी, पेयजल व्यवस्था कितनी सुचारू होगी, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं कितनी सुदृढ़ बनेंगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर कैसे विकसित होंगे। यही कारण है कि पंचायत चुनावों को लोकतंत्र की नींव कहा जाता है। हिमाचल में पंचायत चुनाव राजनीतिक प्रतीकों से मुक्त होते हैं। यहां कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं, बल्कि ईमानदारी, व्यवहार, योग्यता और विकास की सोच की परीक्षा होती है। मतदाता सामने खड़े प्रत्याशी को उसकी निष्ठा, सामाजिक साख और नेतृत्व क्षमता के आधार पर परखता है। यही पंचायत चुनावों की सबसे बड़ी खूबी है कि यहां व्यक्ति स्वयं सबसे बड़ा चुनाव चिन्ह होता है। यह लोकतंत्र का वह रूप है, जहां सत्ता नहीं बल्कि सेवा का मूल्यांकन होता है।हालांकि यह भी एक कटु सत्य है कि कई गांवों में पंचायत चुनाव जातिगत समीकरण, निजी रंजिश और खेमेबाजी की भेंट चढ़ जाते हैं। चुनाव के बाद हार-जीत से उपजी कटुता वर्षों तक गांव के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाती है। आपसी रिश्ते बिगड़ जाते हैं, भाईचारा कमजोर होता है और विकास कार्य ठप पड़ जाते हैं। यही कारण है कि पंचायत चुनावों को युद्ध नहीं, बल्कि सेवा का अवसर समझना अत्यंत आवश्यक है।वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में लगभग 3615 ग्राम पंचायतें हैं। हर पांच वर्ष में होने वाले इन चुनावों में लाखों मतदाता भाग लेते हैं। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हुए राज्य में लगभग 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इससे न केवल महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को मंच मिला है, बल्कि ग्रामीण समाज में समानता की सोच भी मजबूत हुई है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों को भी संविधान के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलता है, जिससे पंचायतें सामाजिक न्याय का सशक्त मंच बनती हैं। ग्राम पंचायतों पर गांव के बुनियादी ढांचे की जिम्मेदारी होती है— सड़क, बिजली, पेयजल, आंगनवाड़ी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और स्कूल जैसी सुविधाओं का रखरखाव इन्हीं प्रतिनिधियों के हाथ में होता है। हिमाचल प्रदेश सरकार हर वर्ष पंचायतों को करोड़ों रुपये का बजट उपलब्ध कराती है। मनरेगा योजना ने ग्रामीणों को रोजगार के साथ-साथ गांवों में सार्वजनिक और निजी ढांचे को भी मजबूत किया है। इसके अलावा जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, स्वच्छ भारत अभियान और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाएं सीधे पंचायतों से जुड़ी हुई हैं। इन योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी संभव है जब पंचायत प्रतिनिधि सक्षम, ईमानदार और आधुनिक सोच वाले हों। आज की पंचायतों को केवल परंपरागत तरीके से नहीं चलाया जा सकता। ऑनलाइन पोर्टल पर काम करना, डिजिटल भुगतान, योजनाओं की समयबद्ध रिपोर्टिंग और ई-गवर्नेंस—अब यह सब पंचायत प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी बन चुकी है। इस दृष्टि से पढ़े-लिखे युवाओं और ऊर्जावान महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सकारात्मक संकेत है। 2021 के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 47 प्रतिशत युवा प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतरे और महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत तक पहुंची। यह बदलाव पंचायतों को विकास का इंजन बना सकता है। पंचायत चुनावों में मतदाता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। कई पंचायतों में हार-जीत का अंतर केवल एक से दस वोट तक रहता है। यह दर्शाता है कि एक-एक वोट कितना निर्णायक है। यदि मतदाता जाति, रिश्तेदारी या व्यक्तिगत द्वेष के आधार पर मतदान करता है, तो उसका खामियाजा पूरे गांव को पांच वर्षों तक भुगतना पड़ता है। इसके विपरीत यदि मतदान विकास, ईमानदारी और नेतृत्व क्षमता को देखकर किया जाए, तो गांव निश्चित रूप से प्रगति करता है। अक्सर देखा गया है कि चुनाव समाप्त होने के बाद भी आपसी मनमुटाव गांव के जीवन को प्रभावित करता रहता है। विजेता और पराजित गुटों की खींचतान में विकास कार्य ठप पड़ जाते हैं। इससे बचने के लिए आवश्यक है कि पंचायत चुनाव को सामूहिक एकता के रूप में देखा जाए। जीतने वाले प्रतिनिधि सभी को साथ लेकर चलें और हारने वाले लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए सहयोग करें। आज गांवों को केवल सड़क और पानी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पंचायतों को पर्यटन, कृषि आधारित उद्योग, शहद, सेब, राजमा, हस्तशिल्प जैसे स्थानीय उत्पादों तथा स्वरोजगार और स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने की दिशा में काम करना होगा। यदि पंचायत स्तर पर सही योजना बने, तो गांव उपभोक्ता नहीं बल्कि उत्पादक बन सकते हैं। Post navigation एग्रीस्टैक: हिमाचल के छोटे किसानों के लिए डिजिटल सशक्तिकरण की नई राह